बिहार की धरती सदियों से देवी-देवताओं, ऋषि-मुनियों और तपस्वियों की तपोभूमि रही है। जब बात सावन के पवित्र महीने की आती है, तो पूरा बिहार 'हर-हर महादेव' और 'बोल बम' के जयकारों से गूंज उठता है। झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम की तरह ही बिहार के मिथिलांचल में भी एक ऐसा शिव मंदिर है, जहां आस्था का ऐसा जनसैलाब उमड़ता है कि इसे "मिथिला का देवघर" कहा जाता है
हम बात कर रहे हैं दरभंगा जिले के जलमग्न इलाके में स्थित बाबा कुशेश्वरस्थान (Kusheshwar Asthan) शिव मंदिर की। यह मंदिर सिर्फ दरभंगा या समस्तीपुर के लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे बिहार और नेपाल के श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थ स्थल है।
अगर आप भी सावन के इस पावन महीने में बाबा कुशेश्वर नाथ के दर्शन की योजना बना रहे हैं या बिहार के इस अद्भुत पर्यटन स्थल के बारे में जानना चाहते हैं, तो यह आर्टिकल आपके लिए है। आइए, जानते हैं बाबा कुशेश्वर नाथ के प्राकट्य की कहानी, मंदिर का इतिहास और यहां की वर्तमान व्यवस्थाओं के बारे में।
कुशेश्वरस्थान का इतिहास कैसे प्रकट हुए बाबा
बाबा कुशेश्वर नाथ का इतिहास बहुत पुराना और चमत्कारी माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं और किंवदंतियों के अनुसार, यह शिवलिंग किसी के द्वारा स्थापित नहीं किया गया है, बल्कि यह एक 'स्वयंभू' (अपने आप प्रकट हुआ) शिवलिंग है।
कहा जाता है कि सदियों पहले यह पूरा इलाका घने जंगलों और 'कुश' (एक प्रकार की पवित्र घास) से ढका हुआ था। इसी जंगल में एक चरवाहा अपनी गायें चराने आता था। उसने देखा कि उसकी एक गाय, जो दूध देती थी, वह अचानक एक विशिष्ट स्थान पर जाकर खड़ी हो जाती है और उसके थनों से स्वतः ही दूध की धारा बहने लगती है। यह दृश्य देखकर चरवाहा हैरान रह गया।
जब यह बात स्थानीय लोगों और तत्कालीन जमींदारों तक पहुंची, तो उस स्थान की खुदाई की गई। खुदाई के दौरान वहां से एक विशाल और अद्भुत शिवलिंग प्रकट हुआ। क्योंकि यह शिवलिंग 'कुश' के जंगलों के बीच मिला था, इसलिए महादेव के इस स्वरूप का नाम 'कुशेश्वर नाथ' पड़ गया। एक अन्य किंवदंती यह भी है कि हल जोतते समय एक किसान का हल पत्थर से टकराया और वहां से रक्त निकलने लगा, जब सफाई की गई तो वहां शिवलिंग विराजमान था।
किसने करवाया मंदिर का निर्माण
शुरुआत में बाबा कुशेश्वर नाथ एक छोटी सी कुटिया में विराजमान थे। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण और जीर्णोद्धार समय-समय पर कई लोगों ने करवाया। बताया जाता है कि 19वीं सदी के आसपास स्थानीय व्यापारियों, जमींदारों और शिवभक्तों के चंदे और सहयोग से इस मंदिर को एक भव्य रूप दिया गया। बाद में, मारवाड़ी समाज और स्थानीय पुजारियों ने मिलकर धर्मशालाओं और मंदिर के प्रांगण का विकास किया। आज जो विशाल शिखरयुक्त मंदिर हम देखते हैं, वह भक्तों की असीम श्रद्धा का ही परिणाम है।
धार्मिक महत्व 'मनोकामना लिंग' के रूप में पूजा
कुशेश्वरस्थान का महत्व इसलिए भी बहुत ज्यादा है क्योंकि इसे 'मनोकामना लिंग' माना जाता है। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से बाबा कुशेश्वर नाथ पर जल अर्पित करता है, उसकी हर मनोकामना पूरी होती है।
सावन के महीने में यहां का नजारा बिल्कुल देवघर जैसा होता है। समस्तीपुर, बेगूसराय, खगड़िया, सहरसा और नेपाल से लाखों श्रद्धालु कांवर लेकर यहां पहुंचते हैं। सिमरिया (गंगा नदी) या झीम नदी से पवित्र जल भरकर भक्त पैदल यात्रा करते हुए बाबा का जलाभिषेक करने आते हैं। सावन की सोमवारी को तो यहां पैर रखने की भी जगह नहीं होती।
मंदिर परिसर और विराजमान देवी-देवता
कुशेश्वरस्थान का मंदिर वास्तुकला का एक सुंदर नमूना है। गर्भगृह में बाबा कुशेश्वर नाथ का प्राचीन शिवलिंग विराजमान है, जो भूमि तल से थोड़ा नीचे है। यहां हमेशा जल भरा रहता है, जो इस बात का प्रतीक है कि गंगा स्वयं महादेव के चरणों को पखार रही हैं।
मुख्य मंदिर के अलावा इस विशाल परिसर में कई अन्य देवी-देवताओं के दर्शन होते हैं
- माता पार्वती का मंदिर: शिव जी के ठीक पास माता गोरी (पार्वती) का सुंदर मंदिर है।
- भगवान गणेश और कार्तिकेय: शिव परिवार के इन दोनों देवताओं की मूर्तियां यहां स्थापित हैं।
- काल भैरव और हनुमान जी: मंदिर की रक्षा और भक्तों के कष्ट दूर करने के लिए बाबा भैरवनाथ और संकटमोचन हनुमान जी का भी भव्य स्थान यहां मौजूद है।
- अब दरभंगा, समस्तीपुर (हसनपुर होते हुए) और खगड़िया से कुशेश्वरस्थान के लिए बेहतरीन पक्की सड़कें बन चुकी हैं।
- आप अपनी निजी गाड़ी, ऑटो या राज्य परिवहन की बसों से सीधे मंदिर के द्वार तक पहुंच सकते हैं।
- समस्तीपुर और हसनपुर से यहां पहुंचना बहुत आसान है। नजदीकी रेलवे स्टेशन हसनपुर रोड और दरभंगा जंक्शन हैं।

