बिहार में सड़कों का जाल बिछ रहा है, यह बात हम रोज अखबारों में पढ़ते हैं। लेकिन जब बात पटना-पूर्णिया 6-लेन ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे की आती है, तो यह सिर्फ एक सड़क नहीं, बल्कि उत्तर बिहार और सीमांचल की तकदीर बदलने वाला प्रोजेक्ट है। इंटरनेट पर इस प्रोजेक्ट को लेकर बहुत सी अधूरी और फर्जी खबरें तैर रही हैं। कोई कह रहा है कल से काम शुरू हो जाएगा, तो कोई इसे सिर्फ चुनावी वादा बता रहा है।
सड़क निर्माण विभाग और एनएचएआई (NHAI) के गलियारों से निकलकर जो असली रिपोर्ट सामने आई है, आज हम इस स्पेशल ब्लॉग में उसकी परत-दर-परत खोलेंगे। रूट क्या है? जमीन अधिग्रहण की असली स्थिति क्या है? आपके गांव से यह गुजरेगा या नहीं? आइए जानते हैं पूरी जमीनी हकीकत।
- कागजी दावे बनाम जमीनी हकीकत क्या है यह प्रोजेक्ट
यह एक्सप्रेसवे पूरी तरह से एक्सेस-कंट्रोल्ड (Access-Controlled) होगा, जिसका मतलब है कि हर दो-चार किलोमीटर पर इसमें गाड़ियां नहीं घुस पाएंगी। इसमें चढ़ने और उतरने के लिए सीमित जगहों पर 'इंटरचेंज' (Flyover-style entries) दिए जाएंगे। विभाग का लक्ष्य है कि पटना से पूर्णिया की जो दूरी अभी तय करने में 7 से 9 घंटे लगते हैं, उसे घटाकर साढ़े तीन घंटे कर दिया जाए। रफ्तार की सीमा 100 से 120 किमी/घंटा तय की जा रही है।
2. रूट का असली सच: किन-किन जिलों और गांवों के नसीब चमकेंगे
इस प्रोजेक्ट की कुल लंबाई लगभग 215 किलोमीटर है। पटना के पास से शुरू होकर यह एक्सप्रेसवे गंगा नदी को पार करते हुए सीधे पूर्णिया की सीमा में दाखिल होगा। विभाग के सर्वे के अनुसार, इस एक्सप्रेसवे का अलाइनमेंट (रूट) इस प्रकार तय किया गया है कि यह कम से कम रिहायशी इलाकों (घरों) को तोड़े और ज्यादा से ज्यादा खाली या खेती वाली जमीन से गुजरे।
यह एक्सप्रेसवे मुख्य रूप से इन जिलों को चीरते हुए आगे बढ़ेगा
- पटना और सारण (दिघवारा बेल्ट): इसकी शुरुआत पटना के बाहरी हिस्से से होगी, जहां जेपी सेतु या नए बन रहे छह-लेन पुल के पास से इसे कनेक्टिविटी दी जाएगी। दिघवारा के रास्ते यह आगे बढ़ेगा।
- वैशाली (हाजीपुर का बाहरी इलाका): वैशाली जिले के कई गांवों की कृषि भूमि इसके दायरे में आ रही है। यहां जमीन की कीमतें अभी से आसमान छूने लगी हैं।
- समस्तीपुर (केंद्रीय बिंदु): समस्तीपुर जिला इस एक्सप्रेसवे का एक बहुत बड़ा जंक्शन बनने जा रहा है। जिले के कल्याणपुर, ताजपुर और रोसड़ा बेल्ट के आस-पास के ग्रामीण इलाकों से इसका सर्वे रूट गुजर रहा है।
- बेगुसराय और खगड़िया: एनएच-31 के समानांतर लेकिन उससे हटकर, यह एक्सप्रेसवे बेगुसराय के बछवाड़ा और खगड़िया के मैदानी इलाकों को छुएगा।
- मधेपुरा और पूर्णिया: मधेपुरा के चौसा और उदाकिशुनगंज के रास्ते होते हुए यह सीधे पूर्णिया के के नगर या मरंगा के पास जाकर खत्म होगा, जहां इसे एनएच-31 से मर्ज कर दिया जाएगा।
- सिविल कंस्ट्रक्शन कॉस्ट (सड़क बनाने का खर्च): लगभग 60% पैसा मिट्टी भराई, कंक्रीट, पुल-पुलिया और सिक्स-लेन ब्लैकटॉप सड़क बनाने में जाएगा।
- लैंड एक्विजिशन कॉस्ट (जमीन का मुआवजा): लगभग 40% पैसा किसानों को उनकी जमीन का उचित मुआवजा देने में खर्च होगा। बिहार में जमीन अधिग्रहण सबसे जटिल काम है क्योंकि यहाँ जमीन के कागजात (खतियान, रसीद) अपडेट नहीं हैं, जिससे अदालती विवादों का डर रहता है।
- DPR की स्थिति: इस एक्सप्रेसवे की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार हो चुकी है। इसका एलाइनमेंट सैद्धांतिक रूप से स्वीकृत है।
- जमीन का सर्वे और 3A नोटिफिकेशन: वर्तमान में सबसे महत्वपूर्ण काम चल रहा है—जमीन की नापी और भू-अर्जन (Land Acquisition) की तैयारी। जिला स्तर पर जिला भू-अर्जन पदाधिकारियों (LAO) को जिम्मेदारी दी गई है कि वे रूट में आने वाले प्लॉट नंबरों का मिलान करें।
- अड़चन कहाँ है? बिहार में सबसे बड़ी समस्या बाढ़ और जलजमाव की है। समस्तीपुर, खगड़िया और मधेपुरा का कुछ हिस्सा लो-लाइंग एरिया (नीचला इलाका) है। यहां एक्सप्रेसवे को जमीन से 3 से 5 मीटर ऊंचा (Elevated or High Embankment) बनाना पड़ेगा, ताकि बाढ़ के समय भी सड़क चालू रहे। इसके लिए मिट्टी की भारी जरूरत होगी, जिसपर पर्यावरण विभाग के साथ तालमेल बिठाया जा रहा है।
- जमीन अधिग्रहण का लक्ष्य सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले कुछ महीनों के भीतर कम से कम 80% जमीन का अधिग्रहण पूरा कर लिया जाए और किसानों के खातों में मुआवजे की राशि भेजनी शुरू कर दी जाए।
- टेंडर प्रक्रिया: उम्मीद की जा रही है कि 2026 के अंत तक या 2027 के शुरुआती महीनों में कंस्ट्रक्शन कंपनियों के लिए फाइनेंशियल बिड्स (टेंडर) आमंत्रित किए जाएंगे।
- निर्माण कार्य और डेडलाइन टेंडर फाइनल होने के बाद जमीन पर वास्तविक काम शुरू होगा। सड़क निर्माण शुरू होने के बाद इसे पूरा करने में कम से कम 36 महीने (3 साल) का समय लगेगा। यानी व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो साल 2029 या 2030 से पहले इस एक्सप्रेसवे पर आम जनता का सफर करना मुमकिन नहीं दिखता।
- ग्रामीण इलाकों में जमीन का जो सरकारी रेट (MVR) होगा
- शहरी या अर्ध-शहरी इलाकों में यह मुआवजा सरकारी रेट का दोगुना होगा
- अगर जमीन पर कोई कुआं, बोरिंग, पेड़ या मकान है, तो उसका मूल्यांकन अलग से करके अतिरिक्त मुआवजा राशि दी जाएगी


